Monday, 10 February 2014

विकास या मूर्ति​या


भारत के राजनेता असली मुद्दों और समस्याओं को समझने में विफल क्यों है ? मैंने कुछ महीने पहले अपने एक लेख में इस बात का ज़िक्र किया था. मैं ​ने उस लेख में उन स्मारकों और स्मारक के विकास में ​नेताओ द्वारा ​अपना समय और ​जनता का ​पैसा खर्च करने का कारण ​भी ​लिखा है​. स्मारको और मूर्तियो का निर्माण मतदाताओ को भावनात्मक रूप से जोड़कर राजनीति​ में अपने वोट बैंक की रक्षा ​करना ​है​. बहन मायावती ने मूर्तियो के निर्माण तो एक कीर्तिमान ही बना डाला उन्होंने बाबा साहेब अम्बेडकर के साथ साथ खुद की प्रतिमा ​भी बनवा दी। ​

​अरब सागर में शिवाजी का एक स्मारक बनाने की भी बात चल रही थी​. ​मैंने सरकार के शिवाजी के स्मारक के नाम पर होने वाली राजनिति का पुरजोर विरोध किया। स्मारक में होने वालो पैसे का इस्तमाल हम ​अन्य सामाजिक विकास के मुद्दों के लिए कर सकते है। सरकार ​का ए मानना है कि ​इस स्मारक से पर्यटन ​बढ़ेगा और सरकारी ​राजस्व में वृद्धि होगी​, परन्तु सरकार ए भूल गयी कि स्मारक पर खर्च हुए पैसे को कमाने में कई वर्ष लग जाएंगे।

​​हम सभी जनाते है कि ​भारत ​का नाम उन देशो में शामिल है जहा आज भी ​कुपोषण ​है। भारत ​का स्वास्थ्य के क्षेत्र में ​विकास ​अभी तक उम्मीद से कम है और हम स्मारकों के विकास पर पैसा खर्च कर रहे हैं​. कई लोगो ​ने ​शिवाजी प्रतिमा के निर्माण के लिए महाराष्ट्र सरकार के फैसले की आलोचना की है, लेकिन अब ​उनमे से ही कई लोग सरदार पटेल की प्रतिमा के निर्माण के लिए मोदी के फैसले का समर्थन कर ​रहे हैं​. ​

मुझे ​लगा था ​नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्ति मूर्ति ​से ​परे ​सोचेंगे, परन्तु नरेंद्र मोदी ने मुझे गलत साबित कर दिया।​नरेंद्र मोदी सरदार पटेल कि मूर्ति ​पर खर्च होनेवाले ​पैसे ​से एक अंतरराष्ट्रीय अस्पताल ​या एक अंतराष्ट्रीय विश्वविद्यालय ​बनाने का फैसला ​करते तो शायद देश के लिए अच्छा होता। 



सरदार की प्रतिमा पर आपकी क्या राय है ?​​ k9kamal@gmail.com पर अपने विचार लिख भेजें.

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