Wednesday, 29 January 2014

कैसे बनेगा तीसरा मंच ?​


राजनीति मे हर नया दिन एक नए जोड़-तोड़ की शुरवात करता है. पिछले कुछ दिनों मे राजनितिक समीकरणों मे अमूलचुल परिवर्तन हुए है। आम आदमी पार्टी के राजनितिक प्रवेश से हुए दिल्ली के राजनीतिको गलियारो के परिवर्तन से सारा देश अचंम्भित रह गया। जंहा कांग्रेस के तीसरे सत्र कि परिकल्पना करना एक मूर्खता होगा, वही तीसरे मंच के विकल्प की बाते जोर पकड़ने लगी है। कुछ महीने पहेले बीजेपी और कांग्रेस के बाद बड़ी पार्टी बनकर उभरने वाली सपा अब खस्ताहाल है।

हाल ही मे हुए कई समाचार चैनलो के सर्वे के माध्यम से ये खबर सामने आई ​है की बीजेपी​ उत्तर भारत और मध्य भारत में चमत्कार दिखा सकती है और दूसरी तरफ बीजेडी, एआएडीऍमके, तृणमूल कांग्रेस, जनता दल यूनाइटेड जैसी ​प्रादेशिक पार्टिया ​भी उनके राज्य में मजबूत हो​ती दिख रही है ​

क्या तीसरा मंच एक विकल्प है?

श्री मनमोहन सिंह ने कुछ ही महीनो पहेले आपने साक्षत्कार मे कहा की गटबंधन की राजनीति मे फैसले लेने काफी कठिन है जिसके कारण आर्थिक बदलाव लाने मे दिक्कते आ रही है. हम भूतकाल मे देख चुके है की किस तरह वामदल ने परमाणु अनुशंधन के फैसले पर UPA -1 से अपना समर्थन वापस ले लिया, UPA -2 मे ममता दीदी ने एलपीजी, डीसेल और एफडीआई के मुद्दे पर अपना समर्थन वापस ले लिया. भाजपा भी NDA के शासनकाल मे गटबंधन की राजनीति के विरोध को देख चुकी है.

वर्तमान समय मे कांग्रेस के पास २०० से भी ज्यादा सांसद है परन्तु श्री मनमोहन सिंह के अनुसार गटबंधन के चलते कड़े फैसले लेने मे सरकार को कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है. तीसरे मंच के सबसे बड़ी पार्टी के पास ​३० से अधिक सांसद नहीं होंगे, तीसरे मंच का समीकरण कांग्रेस के वर्तमान सांसदों की गिनती का ठीक उल्टा है. तीसरे मंच मे कई छोटी मोटी प्रादेशिक पार्टिया होंगी २०० से भी ज्यादा सांसदों का गटबंधन होगा जिससे निर्णय लेना और कठिन हो जायेगा.

इस बात से भी इनकार नहीं कर सकते की ​तीसरे मंच​ कि ​​सभी पार्टिया बन्दर बाँट मे लग जाए​ और राष्ट्रिय मुद्दो को छोड़कर सिर्फ अपने राज्यो के बारे में सोचने लगे। ​

यदि आप ने कांग्रेस और भाजपा के समय मे भारत मे कोई प्रगति नहीं देखी तो आप तीसरे मंच से ज्यादा उम्मीद नहीं लगा सकते है।

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