Sunday, 19 January 2014

महँगाई



रोज़ाना जिए, रोज़ाना मरे इस महँगाई में। 


एक दिन पंकाए, तीन दिन खाए,


चौथे दिन भूखे ही जाए इस महँगाई में। 


रोने से भी आँखों में पानी न आये इस महँगाई में। 


नौकरी कि तलाश में जिंदगी कि बैंड बज जाए इस महँगाई में। 


शराब, शबाब , कबाब एक भाव में आए इस महँगाई में। 


पानी भी सोने के मोल में आए इस महँगाई में। 


रोज़ाना जिए, रोज़ाना मरे इस महँगाई में। 


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