Monday, 8 October 2012

कुछ भी हो सकता है


अपने डेस्क पर बैठ कर मै कुछ सोच रहा था, करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था.
मैंने अपने कंप्यूटर  पर जाकर ट्विट्टर पर लोग इन किया और अपडेट पढ़ने लगा
और अचानक मेरा ध्यान अनुपम खेर के ट्वीट पर गया. अनुपम खेर ने अपने ट्वीट
में  कहा की अपने जीवन मे घटी एक ऐसी घटना मुझे बताइए जिससे आप "कुछ भी हो
सकता है" इस जुमले पर भरोसा करने लगे. दोस्तों आपके मेरे सभी के जीवन मे एक
ऐसा मोड़ आता है जहा हम थक कर रुक जाते है और हमें हमारा लक्ष्य असंभव
दिखने लगता है, परन्तु अचानक कुछ ऐसा होता है जिससे हम अपने लक्ष्य को पा
जाते है और भगवन को धन्यवाद करके मन ही मन सोचते है "कुछ भी हो सकता है".
मैंने अपने जीवन की उस घटना को खेर साहब को बताया जिसके कारण मुझे "कुछ भी
हो सकता है" इस बात पर विश्वास हो गया.

अगले दिन सुबह उठकर मै ऑफिस
जाने के लिए रेडी हो गया, बस की कतार में खड़े खड़े मैंने मोबाइल से ट्विट्टर
लोग इन किया और अनुपम खेर के नाटक का निमंत्रण पाकर दंग रह गया. मैं २४
वर्षो से मुंबई में हु पर आज तक मै कभी किसी फिल्म अभिनेता से नहीं मिला, न
मुझे उनको देखने जाने की फुरसत थी और न उनके पास मुझे मिलने आने की. खेर
साहब ने मुझे ट्वीटर पर एक ईमेल आए.डी दी और कहा की इस पते पर मै अपने बारे
जानकारी दे दू और मुझे उनके नाटक का पास मिल जाएगा. मै मन ही मन खुश हो
रहा था की आज अभिनेता से भी मिलूँगा और जीवन में पहली बार नाटक भी देखूंगा.
ऑफिस पहुच कर मै अपने काम में व्यस्त हो गया.

ठक-ठक........ठक-ठक.........ठक-ठक........ठक-ठक
मेरे
मोबाइल का रिंगटोन बज रहा था, नंबर अंजान था तो मैंने काम की व्यस्तता को
देख कर उसे नहीं उठाया और कुछ समय के बाद मेरा मोबाइल फिर से बजा, नंबर वही
था तो मैंने इस बार फ़ोन उठा लिया. महिला की आवाज ने पूछा कमल तो मैंने
कहा हा बात कर रहा हु. महिला ने कहा मै अनुपम खेर के ऑफिस से बोल रही हो और
आप अपना पास हमारे संताक्रुझ के ऑफिस से आकर ले जाए और इतना कहकर फ़ोन रख
दिया. मै चर्चगेट मे था और ऑफिस से निकलकर संताक्रुझ आना और फिर पास लेकर चर्चगेट जाकर नाटक देखना मुझे थोडा कठिन लगा और अचानक

ठक-ठक........ठक-ठक.........ठक-ठक........ठक-ठक
मेरा
मोबाइल बजने लगा. मैंने देखा तो अनुपम खेर के ऑफिस से फ़ोन आ रहा था.
मैंने झट से फ़ोन उठाया और दूसरी तरफ से मधुर आवाज मे महिला ने कहा कमल तो
मैंने कहा हा बात कर रहा हु, महिला ने मुझे कहा की आप को संताक्रुझ आने की
कोई जरुरत नहीं आप को आपका पास नाटक केंद्र के बाहर ही मिल जाएगा और अब फिर
से कठिन दिखने वाला काम सरल हो गया और मैंने मन ही मन सोचा "कुछ भी हो
सकता है".

खेर साहब ने पूछा था की अपने जीवन की एक घटना बताओ और
मेरे साथ २४ घंटे के अंदर कई घटना इतनिबार हो चुकी थी जिससे मै मन ही मन
सोच रहा था की "कुछ भी हो सकता है".

अकेले नाटक देखने जाना भी मुझे
अच्छा नहीं लगा तो झट से फ़ोन उठाया और प्रभात को फ़ोन कर दिया. प्रभात ने
कहा की यार बॉस के साथ एक मीटिंग में जाना है इस लिए मै नहीं आ पाउँगा
(आये ऍम सॉरी). फिर एक बार मेरे लिए नाटक मे जाना कठिन हो गया और फिर वही
ठक-ठक........ठक-ठक.........ठक-ठक........ठक-ठक और डिस्प्ले पर प्रभात का
नाम आ रहा था मैंने कॉल  उठाकर बोल हां बोल और दूसरी तरफ से प्रभात ने कहा
मीटिंग कैन्सल हो गयी तो मै आ रहा हु चर्चगेट  स्टेशन पर मिलते है और वहा
से साथ जायंगे और मैंने मन ही मन सोचा....

"कुछ भी हो सकता है"

घडी
मे सात बज गए थे पर खेर साहब का कही अता-पता नहीं था कलाकारों को देर से
आने की आदत होती है तो हम इस देरी के लिए तैयार बैठे थे. घडी मे ७.३० बज
रहे थे की अचानक एक आवाज आई "लोग बहुत शांत बैठे है" मैंने मंच पर देखा तो
खेर साहब नहीं दिखे पर आवाज तो खेर साहब की ही थी. लोग यहाँ वहा खेर साहब
को खोज रहे थे और अचानक पीछे के दरवाजे खेर साहब ने एंट्री की, नायक की
एंट्री नायक की तरह. खेर साहब ने लोगो से बात चित की और मंच की तरफ जाने
लगे और बीच मे उन्हें भाग्यश्री मिल गयी और अनुपम खेर ने कहा मैंने
प्यार किया. खेर साहब ने अपने मोबाइल की घंटी बजने का नाटक किया और हम सब
से कहा की हम अपना मोबाइल silent पर रख दे.

खेर साहब का नाटक आरंभ
हो चूका था. खेर साहब एक के बाद एक नए किरदार मे आ रहे थे और हमें उनके
जीवन मे हुई सभी घटनाओ से रुब रु करा रहे थे. उनके बचपन के दिन, उनका
परिवार, उनका स्कूल का नाटक और अंग्रेजी की क्लास. उनका पहला प्यार और
परीक्षा में मिले कम अंक . खेर साहब के हर एक शब्द मे जादू था हर लाइन के
बाद तालियों की आवाज से हाल गुजने लगता और फिर खेर साहब ने कहा की अब हम एक
छोटे से बिराम के लिए रुकेंगे. अभी तक नाटक मे हर जगह खेर साहब असफल हुए
थे. खेर साहब की असफलता के साथ मुझे भी अपने जीवन की असफलता याद आ रही थी
और "कुछ भी हो सकता है" जैसा कुछ नहीं हुआ था.

खेर साहब फिर से मंच
पर आ चुके थे. खेर साहब ने कहा मेरे साथ जो पहेले भाग मे हुआ वो सभी के साथ
होता है परन्तु जो दुसरे भाग मे हुआ वो सिर्फ कुछ लोगो के साथ होता है. अब
जिंदगी के हर एक मोड़ पर खेर साहब सफल हो रहे थे. अभिनय की पढाई में गोल्ड
मेडल मिल गया, मुंबई मे फिल्मो में कम मिल गया, जिस अमिताभ बच्चन को वो
परदे पर देखते थे उनके साथ काम करने लगे, सफलताओ के दौर मे छोटी मोटी
परेशानिया आई परन्तु खेर साहब आगे बढ़ते गए. मै खेर साहब के नाटक मे इस तरह
खो गया था की घडी की तरफ ध्यान ही नहीं था. नाटक ख़त्म हुआ और अचानक मैंने
घडी में देखा तो १० बज गए थे. खेर साहब से हाथ नहीं मिला पाया क्योंकि
जल्द से जल्द घर पहुचकर सुबह वापस काम पर आना था. मै हाल से बहार आया तो मन
ही मन सोचा इस बात हाथ नहीं मिला पाया परन्तु अगली बार  खेर साहब के साथ बैठ कर खाना खाऊंगा
क्योंकि "कुछ भी हो सकता है".





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